कुछ दिनों पहले अखबारों में खबर जोरो पर थी कि एक राजनितिक पार्टी के नेता की बेटी को ससुराल वालो ने दहेज के लिए मार दिया अब सोचने वाली बात है कि एक बड़ी पार्टी के नेता ने कहा कसर छोड़ दी कि ये बदतर हालात आ गए कि उसकी बेटी की जान पर बन आयी। हर पिता चाहता है कि उसकी बेटी को अच्छा पति और अच्छी ससुराल मिले जिसके लिए वो उसी दिन से दहेज जोड़ना शुरू कर देता है जिस दिन से बेटी जनम लेती है पर बड़ी ही विडम्बना है की इसी दहेज़ का भूत माता पिता के सर पे दांत बाये सवार रहता है पिता खुश होना भी चाहता है तो दहेज जोड़ने की चिंता उस ख़ुशी को अगले ही पल काफूर कर देती है।
मेरा बचपना दूरदर्शन की उन टेली फिल्मो को देख कर जिसमे दहेज को सामाजिक कुरीति बताया जाता था लेकिन क्या लोगो पर इसका कुछ भी असर हुआ हो हालात ये है की दहेज कि लालच सिर्फ लड़के वाले ही नहीं रखते वरन लडकिया स्वयं भी रखने लगी है यही नहीं आज के समय में ये स्टेटस सिम्बल बन गया है एक तरफ जहाँ लड़के के माँ-बाप अपने पुत्र के लालन-पालन,पढाई-लिखाई,खिलाई-पिलाई सभी का खर्चा लड़कीवालो से ले लेना चाहते है वही लड़कीवाले अधिक से अधिक दहेज और शादी कि भव्यता दिखा कर अपनी बेटी की ख़ुशी और सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते है पर क्या वास्तव में ये कारगर होती है शायद नहीं ध्यान देने वाली बात है की जो माँ-बाप अपने ही बेटे पर किये गए खर्च कि उगाही उससे करते है जिसकी बेटी के साथ उनका पुत्र जीवन भर रहेगा और जो आगे चल कर उनकी अगली पीढ़ी यानि उनके पोते-पोतियों को जनम देगी तो क्या गारेंटी है की वो अपनी बहू को प्यार और सुरक्षा देंगे,दहेज बेटियों की खुशियों की चाभी नहीं है और न ही ये गारेंटी है उनकी सुरक्षा की लेकिन दुःख की बात है लडकिया भी अब इसे अपना अधिकार मानने लगी हैं मानसिकता वही है कि जितना मोटा दहेज होगा उतनी ससुराल में धाक भी उतनी ही रहेगी हैरानी की या यूँ कहे कि दुःख कि बात है कि इसमें समाज का सबसे पढ़ा लिखा और उच्चवर्ग शामिल है पोस्ट जितनी बड़ी रोकड़ा उतना ज़्यादा,दिक्कत तब पैदा होती है जबकि निम्न और मध्यमवर्ग इसकी नक़ल करता है काफी हद तकनिम्नवर्ग इससे इतना प्रभावित नहीं जितना की मध्यमवर्ग होता है ,मध्यमवर्ग मे अक्सर इस प्रकार कि दहेज उत्पीडन,दहेज हत्याओ जैसी घटनाये होती रहती है
यहाँ मै साफ़ कर दू की मेरा मुद्दा दहेज़ हत्या नहीं बल्कि इसकी जड़ दहेज़ है समाज का वो वर्ग जो समाज सुधार का ज़िम्मा रखते है अगर वही इसमें लिप्त होगा तो सुधार संभव नहीं ऐसा कोई भी रिश्ता जिसकी बुनियाद ही लेन -देन पर टिकी हो वो रिश्ता मन का नहीं होता.................
