Monday, 16 September 2013

गुरु को गुरु रहने दो, भगवान का नाम न दो.........

हम हिंदुस्तानियों कि अक्ल क्या वास्तव में नहीं चलती ? हमने अंग्रेजो को बंदरगाह से शहर, शहर से राज्य, राज्य से राजमहल और राजमहल से सीधे देश का शासक बनने का मौका दिया, यही मौका हमने पाकिस्तान एवं चीन को दिया और यही मौका अब इन् बाबाओ को दे रहे हैं जो दुनिया का सबसे आसान काम करते है, दूसरों को नसीहत देने का! एक यही काम है जिसमे न कुछ मेहनत होती है और न ही कुछ रकम लगनी होती है! श्री राम को वनवास के दौरान आई कठिनाइयों का बखान करने वाले ये संत खुद विलासिता का जीवन गुजारते है vkSj gesa uSfrdrk dk ikB i<+krs jgrs gSA chrs fnuksa ppkZ esa vkbZ ,d dyadxkFkk ds ckjs esa tkudj mlds iz.ksrk ls T;knk HkqDrHkksxh ds ifjtuksa ij dzks/k vk;kA ;g <+ksaxh rks ekSds dh ryk”k djrs gh jgrs gS ij ge [kqn D;wa budk fuokyk cuus dks izLrqr gks tkrs gSA क्या वो माँ-बाप बिलकुल ही अंधे हो गए थे कि उनकी ठीक आँखों के सामने बंद कमरे में कोई बाबा उनकी बच्ची के साथ अकेला है ये कैसे गवारा भी हुआ उन्हेंये समझ के परे है,हमारे साथ यही समस्या सदियों से चली आ रही है कि हम भगवान को उतना नहीं मानते जितना कि उनकी बखान करने वालो को,समय समय पर आसाराम बापू के कई अमर्यादित भाषण या यु कहे सत्संगी विचार सामने आते रहे है आचरण से तो वो घोर अड़ियल और भावनाशून्य ही दीखते थे जिस सन्यासी कि भाषा में ही उग्रता हो वो इश्वर के करीब तो नहीं हो सकता ये वाणी कि सौम्यता ही है कि मंदिरों में राम कि पूजा होती है उग्र रावण कि नहीं........

क्या यही राजनीती है........

यू पी की सपा सरकार के लिए आज़म खान को काबू करना मुश्किल क्यों होता जा रहा है? मुज़फ्फरनगर दंगो के एक दिन बाद जब अखिलेश यादव मीडिया से मुखातिब हुए तो नमाज़ी टोपी में नज़र आये,  वैसे अखिलेश हर समय ये टोपी नहीं लगते पर खासतौर पर पहनी गयी इस टोपी से वो सन्देश क्या देना चाहते थे? ये वही जान सकते है ! उनके ठीक बगल में खड़े आज़म खान को देख यही लग रहा था कि, वो अखिलेश पर पूरी नज़र रखे है कि कही मौका मिलते ही वो टोपी उतार न दें! दोनों कि सोच जो भी रही हो पर इतना जान लीजिए कि वो सोच आम आदमी चाहे वो हिंदू हो या मुसल्मान दोनों में से किसी के भले की नहीं होगी, हमारे देश में नेताओ की जो नस्ल इस समय पॉवर में है वो इतनी खुदगर्जी वाली है कि इन्हें अपने हितों के सिवा कुछ नहीं दीखता चाहे वो कोई भी पार्टी हो सभी के नेताओ का यही हाल है! जिस उम्र में लोग आराम करने का सोचते है उसमे भी सत्ता का लालच इन्हें खाए जा रहा है, किसी टीवी चैंनल पर मुज्ज़फर्नगर दंगो पर बहस करवाई जा रही थी, देख कर यही  लग रहा था कि अगर ये सब एक ही स्टूडियो में होते तो दूसरा भयानक दंगा तो यहाँ हो जाता कोई मर्यादित भाषा नहीं कोई मर्यादित भाषण नहीं बस अपनी बात बोलनी है आज के समय में सपा को वोट देने वाले एक बार ज़रूर सोच रहे होंगे कि कुछ गलत हो गया क्योकि सपा अपने पिछले कार्यकालो में इतनी मजबूर नहीं दिखी थी जितनी इस बार ये शायद नतीजा है अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने का कि, पुराने जड़ीयलो के नखरे उठाने पड़ रहे है सपा सरकार की दशा इस समय उस ७० साल के बुड्ढे कि तरह है जिसने १६ साल कि लड़की से शादी की हो और अब उसके नखरे उठाने में उसकी कमर टूटी जा रही हो.......