Monday, 16 September 2013

क्या यही राजनीती है........

यू पी की सपा सरकार के लिए आज़म खान को काबू करना मुश्किल क्यों होता जा रहा है? मुज़फ्फरनगर दंगो के एक दिन बाद जब अखिलेश यादव मीडिया से मुखातिब हुए तो नमाज़ी टोपी में नज़र आये,  वैसे अखिलेश हर समय ये टोपी नहीं लगते पर खासतौर पर पहनी गयी इस टोपी से वो सन्देश क्या देना चाहते थे? ये वही जान सकते है ! उनके ठीक बगल में खड़े आज़म खान को देख यही लग रहा था कि, वो अखिलेश पर पूरी नज़र रखे है कि कही मौका मिलते ही वो टोपी उतार न दें! दोनों कि सोच जो भी रही हो पर इतना जान लीजिए कि वो सोच आम आदमी चाहे वो हिंदू हो या मुसल्मान दोनों में से किसी के भले की नहीं होगी, हमारे देश में नेताओ की जो नस्ल इस समय पॉवर में है वो इतनी खुदगर्जी वाली है कि इन्हें अपने हितों के सिवा कुछ नहीं दीखता चाहे वो कोई भी पार्टी हो सभी के नेताओ का यही हाल है! जिस उम्र में लोग आराम करने का सोचते है उसमे भी सत्ता का लालच इन्हें खाए जा रहा है, किसी टीवी चैंनल पर मुज्ज़फर्नगर दंगो पर बहस करवाई जा रही थी, देख कर यही  लग रहा था कि अगर ये सब एक ही स्टूडियो में होते तो दूसरा भयानक दंगा तो यहाँ हो जाता कोई मर्यादित भाषा नहीं कोई मर्यादित भाषण नहीं बस अपनी बात बोलनी है आज के समय में सपा को वोट देने वाले एक बार ज़रूर सोच रहे होंगे कि कुछ गलत हो गया क्योकि सपा अपने पिछले कार्यकालो में इतनी मजबूर नहीं दिखी थी जितनी इस बार ये शायद नतीजा है अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने का कि, पुराने जड़ीयलो के नखरे उठाने पड़ रहे है सपा सरकार की दशा इस समय उस ७० साल के बुड्ढे कि तरह है जिसने १६ साल कि लड़की से शादी की हो और अब उसके नखरे उठाने में उसकी कमर टूटी जा रही हो.......

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