Tuesday, 21 May 2013

बच्चे तो बच्चे है..........

 रेशमा और तस्मीना 
पिछले काफी दिनों से हमारे मोहल्ले में कूड़ा उठाने और झाड़ू लगाने दो छोटी बच्चियां  आ रही है एक बच्ची साईकिल वाला कूड़े का ठेला खिचती है तो दूसरी घरो से कूड़ा ला कर ठेले में डाल देती है मोहल्ले के और लोगो की तरह मै  भी उन्हें कूड़ा पकड़ा देती थी पर कुछ दिनों पहले की ही बात है मैंने बड़ी बच्ची जिसका नाम तस्मीना है उसे कूड़ा दिया उसने कूड़ा ले जा कर ठेले पर पलट दिया उसमे  मेरे चार वर्षीय बेटे की एक टूटी हुई पिचकारी थी जैसे ही पिचकारी कूड़े में निकली तो छोटी लड़की जिसका नाम रेशमा था वो तुरंत ठेले की गद्दी से उतरी और उसने जा कर पिचकारी उठा ली मैंने देखा उस बच्ची के चेहरे पर जितनी चमक उस टूटे हुए खिलौने को पा कर थी उतनी तो मेरे बेटे को वो नया खिलौना पा कर नहीं हुई थी ये देख कर मै थोडा भावुक हो गयी सोचने लगी की जहा हम एक तरफ अपने बच्चो को बढ़िया से बढ़िया माहौल देने की कोशिश करते है वही ये बच्चे कितने अभावों में जी रहे है न पूरे कपडे न अच्छा साफ़-सुथरा खाना और घर तो दूर की बात हुई इनके लिए हद तो तब होती है जब कूड़ा उठाते समय ही कोई इन्हें घर का बासी बचा खान दे देता है तो ये उसी कूड़े के ठेले में रख लेती है और बीच बीच में उसमे से निकाल-निकाल कर खाती भी रहती है हम शायद ऐसा करने मात्र की कल्पना करके भी उल्टी कर देंगे पर उन्हें नहीं आती क्योकि उन्हें आदत पड़ चुकी है.मेरी दादी मुझे बड़े होने पर भी चाय का एक कप भी नहीं धोने देती थी क्योकि कही स्कूल या कॉलेज में मेरी सहेलियों को मेरे हाथो से ऐसा न लगे की मै घर का काम करती हु पर ये बच्चिय बारह-तेरह साल की उम्र में ही इतना और ऐसा काम कर रही है की हम सपने में भी नहीं सोच सकते ऐसा कुछ करने का.हमारे देश में लोगो का जोश और जज्बा दिवस के हिसाब से जगता है अगर मदर्स डे है तो मम्मी के लिए प्यार,फादर्स डे पर पापा के लिए पंद्रह अगस्त है तो देश के लिए देश्बक्ति से लबरेज़ हो जाते है हम वैसे ही बाल श्रमिक दिवस यानि बाल श्रमिको की चिंता हम बारह जून भी मानते है पूरा एक हफ्ता स्वयंसेवी संस्था ,अखबार और चैनल ढूंड-ढूंड कर बालश्रमिको को लाते है उनकी समस्या सुनी जाती है संवेदना जताई जाती है थोड़ी बहुत मदद पर कोई ठोस  कदम नहीं मैंने खुद नगरनिगम और अखबारों में इन् बच्चो की फोटो भेजी और लिखा पर कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन ऐसा नहीं है की ये ज़िम्मेदारी बस सरकार और  स्वयंसेवी संस्था की ही है ज़िम्मेदारी हमारी भी है की सामाजिक प्राणी होने के नाते हम उन्  बच्चो से प्रेम का व्यव्हार तो करें ही साथ ही अगर कुछ कर सकते है उनके लिए तो ज़रूर करें आपने सुना तो होगा ही कुछ अच्छा करने की शुरुआत अपने घर से करनी चाहिए क्योकि आदर्श व्यवहार में आये तभी क्रियान्वित होते है शब्दों में वो निष्क्रिय रहते है और इसी कड़ी में मैंने इस नवरात्री को इन् दो कन्याओ को भोग लगाया पूड़ी,सब्जी,हलुआ खा कर इन् बच्चियों के तो चेहरे तो ख़ुशी से चमकने ही लगे इनके पैर छु कर मुझे भी अपार शांति और प्रसन्नता मिली.........घर से मस्जिद है दूर चलो  यूँ करें  किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये......

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