Saturday, 1 June 2013

दहेज खुशियों का गारेंटी कार्ड तो नहीं……....

कुछ दिनों पहले अखबारों में खबर जोरो पर थी  कि एक राजनितिक पार्टी के नेता की बेटी को ससुराल वालो ने दहेज के लिए मार दिया  अब सोचने वाली बात है कि एक बड़ी पार्टी के नेता ने कहा कसर छोड़ दी कि ये बदतर  हालात आ गए कि उसकी बेटी की जान पर बन आयी। हर पिता  चाहता है कि उसकी बेटी को अच्छा पति और अच्छी ससुराल मिले  जिसके लिए वो उसी दिन से दहेज जोड़ना शुरू कर देता है जिस दिन से बेटी जनम लेती है पर बड़ी ही विडम्बना है की  इसी दहेज़ का भूत माता पिता के सर पे दांत बाये सवार रहता है पिता खुश होना भी चाहता है तो दहेज जोड़ने की चिंता उस ख़ुशी  को अगले ही पल काफूर कर  देती है।
                 मेरा बचपना दूरदर्शन की उन टेली फिल्मो  को देख कर जिसमे दहेज को सामाजिक कुरीति बताया  जाता था  लेकिन क्या लोगो पर इसका कुछ भी असर हुआ हो हालात ये है की दहेज कि लालच सिर्फ लड़के वाले ही नहीं रखते वरन लडकिया स्वयं भी रखने लगी है यही नहीं आज के समय में ये स्टेटस सिम्बल बन गया है एक तरफ जहाँ लड़के के माँ-बाप अपने पुत्र के लालन-पालन,पढाई-लिखाई,खिलाई-पिलाई सभी का खर्चा लड़कीवालो से ले लेना चाहते है वही लड़कीवाले अधिक से अधिक दहेज और शादी कि भव्यता दिखा कर अपनी बेटी की ख़ुशी और सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते है पर क्या वास्तव में ये कारगर होती है  शायद नहीं ध्यान देने वाली बात है की जो माँ-बाप अपने ही बेटे पर किये गए खर्च  कि उगाही उससे करते  है जिसकी बेटी के साथ उनका पुत्र जीवन भर रहेगा और जो आगे चल कर उनकी अगली पीढ़ी यानि उनके पोते-पोतियों को जनम देगी तो क्या गारेंटी है की वो अपनी बहू को प्यार और सुरक्षा देंगे,दहेज बेटियों की खुशियों की चाभी नहीं है और न ही ये गारेंटी  है उनकी सुरक्षा की लेकिन  दुःख की बात है लडकिया भी अब इसे अपना अधिकार मानने  लगी हैं मानसिकता वही है कि जितना मोटा दहेज होगा उतनी ससुराल में धाक भी उतनी ही रहेगी हैरानी की या यूँ कहे कि  दुःख कि  बात है कि इसमें  समाज का सबसे पढ़ा लिखा और उच्चवर्ग शामिल है पोस्ट जितनी बड़ी रोकड़ा उतना ज़्यादा,दिक्कत तब पैदा होती है जबकि निम्न और मध्यमवर्ग इसकी नक़ल करता है काफी हद तकनिम्नवर्ग इससे इतना प्रभावित नहीं जितना की मध्यमवर्ग होता है ,मध्यमवर्ग मे अक्सर इस प्रकार कि दहेज  उत्पीडन,दहेज हत्याओ जैसी घटनाये होती रहती है 
            यहाँ मै  साफ़ कर दू की मेरा मुद्दा दहेज़ हत्या नहीं बल्कि इसकी जड़ दहेज़ है समाज का वो वर्ग जो समाज सुधार का ज़िम्मा रखते है अगर वही इसमें लिप्त  होगा तो सुधार संभव नहीं  ऐसा कोई भी रिश्ता जिसकी बुनियाद ही लेन -देन पर टिकी हो वो रिश्ता मन का नहीं होता.................


Tuesday, 21 May 2013

बच्चे तो बच्चे है..........

 रेशमा और तस्मीना 
पिछले काफी दिनों से हमारे मोहल्ले में कूड़ा उठाने और झाड़ू लगाने दो छोटी बच्चियां  आ रही है एक बच्ची साईकिल वाला कूड़े का ठेला खिचती है तो दूसरी घरो से कूड़ा ला कर ठेले में डाल देती है मोहल्ले के और लोगो की तरह मै  भी उन्हें कूड़ा पकड़ा देती थी पर कुछ दिनों पहले की ही बात है मैंने बड़ी बच्ची जिसका नाम तस्मीना है उसे कूड़ा दिया उसने कूड़ा ले जा कर ठेले पर पलट दिया उसमे  मेरे चार वर्षीय बेटे की एक टूटी हुई पिचकारी थी जैसे ही पिचकारी कूड़े में निकली तो छोटी लड़की जिसका नाम रेशमा था वो तुरंत ठेले की गद्दी से उतरी और उसने जा कर पिचकारी उठा ली मैंने देखा उस बच्ची के चेहरे पर जितनी चमक उस टूटे हुए खिलौने को पा कर थी उतनी तो मेरे बेटे को वो नया खिलौना पा कर नहीं हुई थी ये देख कर मै थोडा भावुक हो गयी सोचने लगी की जहा हम एक तरफ अपने बच्चो को बढ़िया से बढ़िया माहौल देने की कोशिश करते है वही ये बच्चे कितने अभावों में जी रहे है न पूरे कपडे न अच्छा साफ़-सुथरा खाना और घर तो दूर की बात हुई इनके लिए हद तो तब होती है जब कूड़ा उठाते समय ही कोई इन्हें घर का बासी बचा खान दे देता है तो ये उसी कूड़े के ठेले में रख लेती है और बीच बीच में उसमे से निकाल-निकाल कर खाती भी रहती है हम शायद ऐसा करने मात्र की कल्पना करके भी उल्टी कर देंगे पर उन्हें नहीं आती क्योकि उन्हें आदत पड़ चुकी है.मेरी दादी मुझे बड़े होने पर भी चाय का एक कप भी नहीं धोने देती थी क्योकि कही स्कूल या कॉलेज में मेरी सहेलियों को मेरे हाथो से ऐसा न लगे की मै घर का काम करती हु पर ये बच्चिय बारह-तेरह साल की उम्र में ही इतना और ऐसा काम कर रही है की हम सपने में भी नहीं सोच सकते ऐसा कुछ करने का.हमारे देश में लोगो का जोश और जज्बा दिवस के हिसाब से जगता है अगर मदर्स डे है तो मम्मी के लिए प्यार,फादर्स डे पर पापा के लिए पंद्रह अगस्त है तो देश के लिए देश्बक्ति से लबरेज़ हो जाते है हम वैसे ही बाल श्रमिक दिवस यानि बाल श्रमिको की चिंता हम बारह जून भी मानते है पूरा एक हफ्ता स्वयंसेवी संस्था ,अखबार और चैनल ढूंड-ढूंड कर बालश्रमिको को लाते है उनकी समस्या सुनी जाती है संवेदना जताई जाती है थोड़ी बहुत मदद पर कोई ठोस  कदम नहीं मैंने खुद नगरनिगम और अखबारों में इन् बच्चो की फोटो भेजी और लिखा पर कोई फर्क नहीं पड़ा लेकिन ऐसा नहीं है की ये ज़िम्मेदारी बस सरकार और  स्वयंसेवी संस्था की ही है ज़िम्मेदारी हमारी भी है की सामाजिक प्राणी होने के नाते हम उन्  बच्चो से प्रेम का व्यव्हार तो करें ही साथ ही अगर कुछ कर सकते है उनके लिए तो ज़रूर करें आपने सुना तो होगा ही कुछ अच्छा करने की शुरुआत अपने घर से करनी चाहिए क्योकि आदर्श व्यवहार में आये तभी क्रियान्वित होते है शब्दों में वो निष्क्रिय रहते है और इसी कड़ी में मैंने इस नवरात्री को इन् दो कन्याओ को भोग लगाया पूड़ी,सब्जी,हलुआ खा कर इन् बच्चियों के तो चेहरे तो ख़ुशी से चमकने ही लगे इनके पैर छु कर मुझे भी अपार शांति और प्रसन्नता मिली.........घर से मस्जिद है दूर चलो  यूँ करें  किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये......

Friday, 10 May 2013

बच्चे कभी - कभी ही खेलने आते हैं

वो जब सवा चार साल का हुआ तो उसे स्कूल में दाखिल करा दिया गया,  वो सुबह पांच बजे उठता, नहाता, तैयार होता , स्कूल जाता, लौट कर आता, खाना  खाता  सो जाता , शाम को टिउशन का होमवर्क करता, टिउशन जाता लौटता, अपने पिता को पढाई का ब्यौरा देता, डांट खाता और टी वी पर कार्टून देखता..................और हाँ !! कभी -कभी कालोनी में खेलने भी जाता पर उसे अकेले ही खेलना पड़ता,
कालोनी के दूसरे  बच्चे  भी कभी - कभी ही खेलने आते हैं। 

बचपन की मीठी यादें


बचपन की मीठी यादें 


याद आता है वह सुहाना बचपन, 
मीठी यादें और वो पागलपन। 
हंसी ठिठोली सखियों के साथ, 
काश लौट आए वो दौर, फिर से आज। 

जीना चाहती हूँ सब, फिर एक बार। 
जो सपने बचपन में रह गये अधूरे, 
काश उनको कर पाऊँ मैं, साकार। 
आ जाये जिन्दगी में यादों की बहार। 

माँ का लाड-प्यार से भरा हाथ, 
बाबू जी की मीठी फटकार। 
किया मेरी बहन ने मुझे 
अपनी शैतानियों से तंग, 
पर बड़ा भाई रहा हमेशा मेरे संग। 

वह दिन-भर खेलना दौड़म-भाग, 
घर आकर गाना माँ से सिर्फ एक राग। 
थकी बहुत हूँ माँ मैं आज, 
फिर कभी कर लूंगी पढ़ाई का काम-काज। 

दिल में था सबके लिए सिर्फ प्यार। 
माँ-बाप से जुड़े थे दिल के तार। 
ईश्वर से है बस, एक ही गुहार। 
बच्चे फिर करने लगें माँ-बाप का आदर सत्कार। 

काश! मिट जाये भेदभाव का विचार। 
और बच्चों से लेकर सीख बड़े लायें, 
अपने अंदर कुछ सुधार। 
भर लें अपने मन में सिर्फ प्यार।

सिदराह जमाल, कक्षा- 9 
लामार्टीनियर्स गर्ल्स कॉलेज,
 लखनऊ   




Monday, 6 May 2013

हर अवैध संतान लड़की तो नही


मेरे भाई साहब की दो प्यारी सी बेटियाँ है एक सात साल की और दूसरी चार साल की पढने लिखने में बेहद तेज़ या यूँ कहिये उन दोनों के आने के बाद हमारे घर में खुशियों के साथ -साथ लक्ष्मी जी ने भी कदम रक्खा था मुझे याद है जब भइया की पहली बेटी सौम्य हुई थी हम जिसको-जिसको फोन किया था उसने हमे बधाइयाँ दी थी लेकिन जब चोटी बेटी अनुष्का हुई तो फोन करने पर सांत्वना मिली समझ नही आया की लोगो ने ऐसा क्यो किया लेकिन आज समझ आता है की लड़कियों के लिए हमारा देश कितना ही आधुनिक क्यो न हो जाए लेकिन लड़कियों के लिए यहाँ के लोगो की मानसिकता नही बदलेगी दूर दराज़ के गॉंव देहात की तो जाने दीजिये शहरो के आधुनिक कहे जाने वाले लोगो की सोच भी
अभी वही की वही है अखबारी आंकडे देखे तो लगभग रोजाना एक-दो नवजात बच्चियां यहाँ वहा पड़ी मिलती है कही पन्नी में लिपटी तो कही बिना कपड़ो के नाले के किनारे जहा उन्हें चीटियाँ नोच रही होती है सोचती हूँ जहा मै अपने दो माह के बेटे को इन सर्दियों में चौबीसों घंटे गरम कम्बलों के बीच ब्लोवर में रखती हूँ वही इस हांड कंपा देने वाली सर्दी में वो बच्चियां कितनी तकलीफ झेलती रही होंगी,क्यो लड़कियों का जीवन ही इतना संघर्ष से भरा होता है हर अवैध संतान लड़की तो नही होती सच कहे तो बच्चे कभी अवैध नही बच्चे तो बच्चे होते है लेकिन हमारा देश जहा था वही है बस तरीके बदल गए है अब दूध में डूबा कर या गला दबा कर मारने की जगह थोडी सवेदना दिखाते है अब जिंदा फेक देते है कुत्तो के नोचने घसोटने या चींटियों या अन्य कीडे-मकोडों का आहार बनने के लिए.

Saturday, 4 May 2013